रविवार, 23 जुलाई 2017

रागदेश: नेताजी और जबलपुर

 [1938 के त्रिपुरी (जबलपुर) अधिवेशन के बाद नेताजी और  कांग्रेस की राहें जुदा हुई। अधिवेशन के चार महीने बाद नेताजी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। राज्य सभा टेलीविज़न की पहली फीचर फिल्म रागदेश के बहाने  इतिहास के इस रोचक पहलू का जिक्र ]  

(जबलपुर में तिलवारा मार्ग पर नेताजी की प्रतिमा) 
 जब-जबलपुर में आज की पेशकश ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस और कांग्रेस का त्रिपुरी (जबलपुर) अधिवेशन’ । 28 जुलाई को ‘राज्य सभा टेलीविज़न’ की पहली फ़ीचर फ़िल्म ‘रागदेश’ रिलीज़ हो रही है। ‘लाल क़िला ट्रायल’ की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म में आज़ाद हिंद फौज के तीन अफ़सरों पर चले मुकदमे की दास्तां है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस आज़ाद हिंद फौज से जुड़ी कई ऐसी अनछुई कहानियां हैं। जो सिनेमाई क़िस्सागोई के नज़रिये से मुफ़ीद मानी जा सकती हैं। ‘रागदेश’ के बहाने नेताजी और कांग्रेस के त्रिपुरी (जबलपुर) अधिवेशन का जिक्र इसलिए भी अहम है, क्योंकि ये अधिवेशन नेताजी और भारत के आज़ादी के आंदोलन के इतिहास में एक अहम मोड़ साबित हुआ। और यहां से ही नेताजी और कांग्रेस के रास्ते जुदा होने की नींव भी पड़ी।
(राज्य सभा टेलीविज़न की पहली फ़ीचर फ़िल्म रागदेश का पोस्टर)

‘नेताजी कांग्रेस अध्यक्ष बने’

जनवरी 1938 में त्रिपुरी में हुए कांग्रेस के 52 वें अधिवेशन में नेताजी पट्टाभि सीतारमैया को 203 वोटों से हराकर ... कांग्रेस अध्यक्ष बने। नेताजी की जीत पर जबलपुर में 52 हाथियों का शानदार जुलूस निकाला गया। बड़ी तादाद में लोगों ने जश्न मनाया। हालांकि तेज़ बुखार होने की वजह से नेताजी ने  इसमें शिरकत नहीं की थी। गांधीजी ने नेताजी की जीत को खुद की हार के रूप में लिया। क्योंकि इस चुनाव में गांधीजी ने पट्टाभि का समर्थन किया था। यहां तक की गांधीजी ने तब कहा था “पट्टाभि की हार मेरी व्यक्तिगत हार है।” इस अधिवेशन के करीब चार महीने बाद नेताजी ने खुद ही कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ दिया। और आज़ादी के आंदोलन के लिए संघर्ष की नई राह चुन ली। 
(फ़ाइल फ़ोटो - नेताजी की जीत का जश्न, 52 हाथियों का विशाल जुलूस त्रिपुरी अधिवेशन 1938)
‘नेताजी का भाषण’

104 डिग्री तेज़ बुख़ार होने के बावजूद ...29 जनवरी 1939 को त्रिपुरी अधिवेशन में नेताजी ने ओजस्वी भाषण दिया। जिसमें तात्कालिक परिस्थितियों समकालिक राजनीति को लेकर उन्होंने खुद का नज़रिया रखा। नेताजी ने कहा “मुझे इस बात का दुख है कि कांग्रेस में कुछ ऐसे निराशावादी व्यक्ति हैं। जो ये सोचते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य पर किसी शक्तिशाली आघात के लिए ये समय अनुकूल नहीं है। किंतु यर्थाथ दृष्टि से विचार करने पर, मैं निराशा का कोई आधार नहीं देखता।”    

‘नेताजी का जबलपुर से नाता’

त्रिपुरी अधिवेशन समेत नेताजी तीन बार जबलपुर आए। 1932 को उन्हें सिवनी की जेल से केंद्रीय जेल लाया गया। इसके बाद 1933 में भी वो यहां आए। जबलपुर की केंद्रीय जेल में नेताजी की याद में एक स्मारक बनाया गया है। उनकी इन यादों को संजोने के लिए ... जबलपुर की सेंट्रल जेल और मेडिकल कॉलेज नेताजी के नाम पर ही रखा गया है।
(केंद्रीय जेल में बना नेताजी का स्मारक)
‘नेताजी और त्रिपुरी अधिवेशन का स्मारक’

जबलपुर का कमानिया गेट इस अधिवेशन की याद में बनाया गया। तिलवारा सड़क पर बीचों बीच नेताजी की एक आदमकद प्रतिमा भी है। लेकिन अफ़सोस की बात तिलवारा पहाड़ी पर त्रिपुरी अधिवेशन की याद में बनाया गया ‘त्रिपुरी स्मारक’ अब जीर्णशीर्ण अवस्था में है। सरकारिया उपेक्षा का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यहां इससे जुड़े इतिहास को बताने के लिए एक बोर्ड स्मारिका या पट्टिका भी नहीं है। और तो और नेताजी की कोई मूर्ति नहीं है। 


(त्रिपुरी अधिवेशन स्मारक जबलपुर)

 
(त्रिपुरी स्मारक में ध्वजारोहण का खंबा)
तिरंगा लहराने के लिए एक खंबा जरूर है। शायद पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी को यहां झंडा लहराया जाता हो। नेताजी की याद शायद नारे भी लगते हों। इस बारें में जल्द ही सूबे के मुख्यमंत्री को पत्र लिखने वाला हूं। हालांकि इस पहाड़ी के ठीक नीचे बाग़ बग़ीचे वाला गांधीजी और नेहरू जी का स्मारक भी है। जो बेहद अच्छी हालत में है। जबलपुर आएं तो इन सभी जगहों पर नेताजी को नमन करने के लिए ज़रूर जाएं।








राज्य सभा टेलीविज़न, Gurdeep Singh Sappal सर, तिग्मांशु भाई पूरी टीम को ‘रागदेश’ की सफलता के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं!!! 


#raagdesh 

गुरुवार, 24 जून 2010

मेरी कवर स्टोरी दैनिक भास्कर रसरंग


"आप सभी के लिए दैनिक भास्कर रविवारीय रसरंग में प्रकाशित कवर स्टोरी पोस्ट कर रहा हूँ ।
कृपया अपनी अमूल्य राय से मुझे अवगत ज़रुरु कराये
मेरा ई मेल पता है :

लिंक :
शुभकामनाओं के साथ सदैव आपका ही
अमिताभ अरुण दुबे
(television journalist )
new delhi
+91 8103360233

शनिवार, 8 मई 2010

माँ


धूप में छाया जैसी ,छाँव में नदिया जैसी
हाथ दुआओं वाले ,रोशन करे उजाले ।



प्रेम की मूरत दया की सूरत
ऐसी और कहाँ है ,जैसी मेरी माँ है ।


तन में जीवन जैसी ,जीवन में बगिया जैसी
जिसके दर्शन में हो भगवन ,ऐसी और कहाँ है

जैसी मेरी माँ है !!!


(नज्म निदा फाजली )

आप सभी को मदर्स डे की शुभकामनाएं!!!

शुक्रिया माँ जीवन को जीवन बनाने के लिए ...हम सबकी ज़िन्दगी अगर सुंदर है तो वो तुम्हारी वजह से है मेरा प्यार मेरा प्रणाम


गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

श्रद्धांजलि : सुखदेव

(स्मृति शेष : सुखदेव डोंगरे )
(१९८४-२०१०)

हम सब की ज़िन्दगी में एक वक़्त ऐसा आता है ...जब हमारे शब्द ..हमारी भावनाएं ...हमारी अभिव्यक्ति ..सब कुछ खामोश हो जाते है । आँखे रोना चाहती है ...दिल रोना चाहता है ...और हम खुद को बेबस समझने लगते है । आज ऐसी ही मनोदशा से सुखदेव डोंगरे के हम सभी मित्र गुज़र रहे है । उमरानाला गाँव में सुखदेव के साथ हम सभी ने एक लम्बा वक्त बिताया था। सुखदेव हम सभी की अच्छी यादों का एक अभिन्न और महत्तवपूर्ण हिस्सा था । २५ फरवरी २०१० एक लंबी बीमारी और हादसे से पीड़ित हमारा यह दोस्त सुबह ग्यारह बजे हमेशा के लिए हमसे विदा हो गया । उसके दुखद निधन के दो दिन बाद आज जब में ये पोस्ट लिख रहा हूँ ..तब भी मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ की ...आज मैं अपनी और सुखदेव की किस मुलाक़ात को याद करूँ ...उसके साथ मेरी पहली मुलाक़ात या आखरी ..जब वो ज़िन्दगी और मौत से संघर्ष करना रहा था ।

सुखदेव की शिक्षा नितांत अभावों में हुई ...उसके घर में बिजली भी नहीं थी ...दिए की रौशनी में रातों को पढाई कर उसने पूरे क्षेत्र में अपनी पहचान बनायीं थी । हमेशा अव्वल आना स्कूल के कालेज में साहित्यिक गतिविधियों में हमेशा टॉप रहा ... कुल मिलाकर सुखदेव एक बेहद प्रतिभाशाली छात्र रहा । पत्रकारिता और साहित्य से भी वो सतत रूप से जुडा रहा । वो " दीपक" "दीप" उपनाम से अपनी रचनाएँ लिखता था ।

मेरे एक अन्य मित्र रामकृष्ण डोंगरे "तृष्णा" और सुखदेव के साथ हम तीनों की त्रिवेणी खूब जमती थी । अक्सर चाय की दुकानों में हम आपस में रचनाओं को सुनते सुनाते थे। गाँव की गलियों सड़कों पुलिया तो कभी घर की छत पर हमारी महफ़िल होती ।क्षेत्र के सुप्रसिद्ध सूफी संत दीवाने शाह बाबा की दरगाह तन्सरा में भी हम साथ में जाते । सुखदेव का मुंडन संस्कार भी यही हुआ था .. बारहवी कक्षा में सुखदेव को "बेस्ट स्टुडेंट " का अवार्ड मिला था । हम ने सृजन नाम से एक सांस्कृतिक संस्था भी बनायीं थी ।
दिल्ली आने के बाद भी हम खतों के ज़रिये जुड़े रहे। दिल्ली से जब भी मैं घर आता मेरा ज्यादा वक्त उसके साथ बीतता ...सुखदेव के बारे में और भी चर्चा करूँगा ...सुखदेव अब हमारे बीच नहीं है ...उमरानाला पोस्ट में अपने इस मित्र को शिद्दत से आज याद करना रहा हूँ ...मेरी आँखे नम है ..उसकी जुदाई का यह ग़म बड़ा है ...मेरी और उसके सभी दोस्तों की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि ...
"आज तुम नहीं हो इस महफ़िल में
तुम्हारा ज़िक्र रहेगा सदा इस महफ़िल में "
परमपिता परमेश्वर सुखदेव की आत्मा को शांति प्रदान करे ..परमपिता परमेश्वर उसे हर वो सुख प्रदान करे जो उसे इस जीवन में नहीं मिले
सुखदेव तुम सदा हमारे साथ रहोगे
हमारी यादों में ...हमारी बातो में

ॐ शांति ! शांति !!शांति !!!

सोमवार, 25 जनवरी 2010

इक उम्मीद


गणतंत्र बने गुणतंत्र
बस यही हो
हर भारतीय का मंत्र



आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

सोमवार, 11 जनवरी 2010

हैप्पी २०१०!!


उजाले हमारे बस में हैं ,
खुशियाँ हमारे हक में है .
आप सभी मस्त रहे खुश रहे
आप सभी को नव वर्ष व् नव दशक की हार्दिक शुभकामनायें !!!
यही अभिलाषा
शुभकामनाये
आपका
अमिताभ

रविवार, 2 अगस्त 2009

अदृश्य शक्ति (समापन किस्त )

ओबामा की उमरानाला यात्रा की घड़ी जैसे जैसे समीप आ रही थी । वैसे वैसे प्रशासन की सक्रियता भी बढ़ने लगी । ओबामा की उमरानाला विज़िट के मद्देनज़र एक रूपरेखा समिति बनाई गई । चूँकि समिति का नाम रूपरेखा समिति था । इसलिए गाँव की सरपंच रेखा बाई को सर्वसम्मति से इसका अध्यक्ष का नियुक्त कर दिया गया । वैसे रेखा बाई इससमिति की बैठकों में एक बार भी नही बैठी .. वो पूरे समय चुनाव प्रचार में ही रही । हमारे देश की परम्परा है अक्सर हमारे देश में लोगो के नाम से ही काम हो जाता है ।
बहरहाल , शनिवार की शाम समिति की अति महतवपूर्ण बैठकहोनी थी । इसमें प्रशासन के लोगो के साथ गाँव के गणमान्य लोगो को भी बुलाया गया । ये एक उच्चस्तरीय बैठक थी ..जिसका एजेंडा ओबामा के कार्यक्रम को अन्तिम रूप देना था ...तैयारियों का जायजा लेना था । इसउच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता क्षेत्र के कमिश्नर कर रहे थे । इसमें पुलिस महकमें का एक छत्र राज था । हमारेदेश की एक और परम्परा है "यहाँ उच्चस्तरीय बैठकों को निम्नस्तरीय होने में पल भर भी नही लगता " ।
अग्रेजों के ज़माने का बना रेस्ट हाउस पुलिस चौकी के पास ही है । सो कमिश्नर साहब काडेरा भी यहीं था । उन्हें बैठक में बुलाने के लिए नए रंगरूटों के दल बाल को भेजा गया । धारी वाली झंगोला अंडरवेअर में कमिश्नर साहब संध्या कालीन पूजा में लीन थे । नए रंगरूटों के लिए उन्हें धारी वाले अंडरवियर में देखनाएक सुखद अनुभव था । वे मन ही मन महकमे के बड़े साहब की आरती उतरने में लीन हो गए ...साहब की आरतीभी पूरी हो चुकी थी ..बस चाय पीकर पहुँचता हूँ ...सलामी की आवाजे ..जी साहब ! सावधान विश्राम ....कर रंगरूटचौकी में आ गए ।
शाम के मधुरिम वातावरण में बैठक शुरू हो गई । साहब जी वो घीसू कह रहा था ...शेक्सपीअर ने कभी सेक्स किया या नही ? " कमिश्नर साहब ने लम्बी साँस लेकर कहा ...शेक्सपीअर कापता नही लेकिन हमने अपनी लम्बी नौकरी में जो भी काम किया उसमें बस सेक्स ही सेक्स किया । जबभी हमें जो काम सौपा गया हमने उसके साथ सेक्स ही किया । वाह वाह से महकमे के लोग साहबजी को अभिभूतकरने लगे । चलों अब ओबामा के कार्यक्रम के साथ भी सेक्स कर लिया जाए ...
ओबामा के कार्यक्रम को अन्तिम रूप दे दिया गयास्कूल के बच्चों के कार्यक्रम होंगे ( ये भी हमारी परम्परा ही है किसी भी कार्यक्रम चाहे वो राजनैतिक हो या गैरराजनीतिक भीड़ बढ़ाने के लिए स्कूल के बच्चे हमारे देश में सहज और सदैव उपलब्ध रहते हैं ) । गणमान्य नागरिको द्वारा उनका सम्मान ..स्वागत स्थल पर में महापुरुषों कीमूर्तियों पर माल्यार्पण ,ओबामा का भाषण .. आदि आदि । ओबामा उमरानाला आ रहा है ...ये गाँव के लोगो के लिएसम्मान की बात है ..उन्होंने गांववासियों से प्रशासन को पूरा सहयोग देने की अपील की । गौरतलब है इस बैठक मेंगाँव के छटे बदमाशों को भी बुलाया गया था उनको साहबजी ने हिदायत दी की इस दौरान कोई भी वारदात न करेपुलिस की नाक आन बान शान गाँव के बदमाशो के हाथ में थी ।
इधर ओबामा के आगमन की तैयारी हो रहीथी उधर अमेरिका की खुफिया एजेन्सी गुप्तचर "अदृश्य शक्ति" को लेकर परेशान थे । राधेश्याम भी पिछले कईदिनों से अदृश्य शक्ति को लेकर परेशान था उसे ख्वाब में भी अदृश्य शक्ति परेशान कर रही थी ।
अचानक ओबामा ओबामा $$$ अदृश्य शक्ति अदृश्य शक्ति $$$ वो चीख के नींद से उठ गया ।तो ये सपना थालेकिन अदृश्य शक्ति का सवाल सारा दिन राधेश्याम को परेशान करता रहा । रोज़ की तरह सारा दिन वो चुनावप्रचार की कांव कांव में लीन रहा । आख़िर रात में उसे अदृश्य शक्ति ने दर्शन दे ही दिए .... अदृश्य शक्ति ने सफ़ेद पोशाक पहने एक नेता के रूप में उसे दर्शन दिए ...जिसे वो पाँच साल के लिए बड़ी उम्मीदों से चुनता है ..और फ़िर पूरे पाँच साल नाउम्मीद होके जीता है ...

बुधवार, 25 मार्च 2009

अदृश्य शक्ति

मैं न कहता कहता था अमेरिका को भी एक दिन हमारी ताक़त का एहसास हो जाएगा । दौड़ा दौड़ा एक दिन हमारे पीछे आ जाएगा । ये बताओ आज का अख़बार आज सुबह की खबर किसने किसने देखी ? बारहवी आर्ट संकाय के लगभग सभी बच्चो ने हाथ खड़े कर दिए । गुड गुड वैरी गुड ...मुंह में आ रही तंबाखू की पीक को क्लास की पीछे वाली खिड़की से बहार थूकते हुए राजनीति विज्ञान के टीचर विश्वजीत ने कहा .... तम्बाकू की नई खुराक को रगड़ते हुए ..क्यों बे सागर क्या खास ख़बर है ???
स्स्स्सर अमेरिका का प्रेसीडेंट ओबामा हिंदुस्तान की डेमोक्रेसी को दखने समझने के लिए उमरानाला आ रहा है ....स्स्स्स्सर क्या वो सचमुच हमारे गाँव में आ रहा है । आएगा क्यों नही ? हमारी डेमोक्रेसी बल्ड की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी है । अच्छा तुम लोग ये जानना नही चाहोगे ...कि वो सिर्फ़ चुनाव देखने आ रहा है या कुछ और ही राज़ है ।
राज़ ...सर हमारे गाँव में आने के पीछे क्या राज़ हो सकता है ?राज़ तो है ...सोचो । कितनी बार कहा है ध्यान से अख़बार पढ़ा करो । राजनीति की पढ़ाई है । घर में किताबों को देख कर पूरी नही होगी । राजनीति की असली पढ़ाई तो अख़बार पढने से होती है (मास्टर जी अपने ज्ञान की गंगा बहाने लगे )
जानते हो मेरे घर में कितने अख़बार आते हैं (क्लास के कुछ शरारती बच्चे एक ख़ुद का ख़रीदा हुआ बाकी दस इन्हा उन्हा से बटोर लेता है । और तो और स्कूल की लाइब्रेरी में भी एक भी अखबार बचने नही देता ) क्यों रे गोधन तू तो मेरे पड़ोस में रहता है । ज़रा खडे होके बता मेरे घर में कितने अख़बार आते हैं .... स्स्सर दस नही नही ग्यारह बारह ....
आप लोग हैं कि अख़बार नही पढ़ते न्यूज़ चैनल नही देखते भइया आपकी पढ़ाई तो राम भरोसे है ।
हाँ ! तो मैं कह रह था ...इसमे अमेरिका की कोई न कोई चाल है । मैं तो कहूँगा ओबामा उमरानाला आ रहा है तो ये एक बड़ी साजिश है । देखना चुनाव के बाद स्विस बैंक में बोरे भरके रुपया दबाने वाले कई नेताओं की छुट्टी हो जायेगी । अरे अमेरिका में मंदी है । और यहाँ चुनाव में जैसे रुपयों का समन्दर बह रहा है । इतना पैसा कहाँ से आ रहा है । ये सब जानने ही वो आ रहा है । चुनाव उनाव तो बहाना है ।
इधर क्लास में विश्वजीत मास्साब का लेक्चर चल रहा था । गाँव की गलियों चौपालों खेतो में ओबामा ओबामा की लहर बह रही थी । हर तरफ ओबामा के चर्चे हो रहे थे । लेकिन गाँव के लगभग आखरी छोर पर उमरानाला पुलिस चौकी में गाँव के सिपाहियों मुंशियों की अलग तरह की परेड चल रही थी । बड़े बड़े अधिकारी रोज़ चौकी में आने लगे थे । आख़िर अमेरिका का राष्ट्रपति आ रहा है । पूरे प्रदेश के पुलिस के आला अधिकारीयों ने गाँव के आस पास डेरा जमा लिया था । चौकी के पास खाली पड़े खलियान को दिन रात मेहनत कर पुलिस ग्राउंड का रूप दिया जा रहा था ।
डीजीपी बंसल ने चौकी इंचार्ज रूप सिंह परिहार को आवाज़ लगाई ...रूप सिंह कहाँ मर गया बे । आया साबजी । सावधान विसराम रूप ने जम कर एक सेलूट मारा । देख रूप ...ये सेलूट वेलूट तो कुछ दिन के लिए अपनी गाँ *** में डाल ले किस किस को सेलूट मारेगा नालायक । हमे देख रहा है ...किनते सारे बाप दादे खड़े है । देख सबको घं ** पे मार रहे हैं न !!!
रूप सिंह टोपी के अन्दर हाथ को डालकर सर खुजाते हुए जी साब जी । मैं कह रहा था वो खलियान धीरे धीरे मैदान जैसा लगने लगा है जी ..गाँव के कुछ निक्कमे लोगो को भी डंडा दिखाके काम पे लगा दिया है । बंसल ने सिगरेट का काश लेते हुए । इस ओबामा के बच्चे को भी जाने क्या सूझी जो इस गाँव में मर**ने आ रहा है । हजुर ठीक कहते हो । अरे हाँ यार !!चुनाव में इधर उधर ड्यूटी के नाम पर घूम लेते अच्छा मनोरंजन हो जाता । एक दो छुटभैयों को घुसे जमा देता ...चुनाव के बाद तो सालो की हजुरी करनी पड़ती है । एक बार केन्द्र में अपनी सरकार आए फ़िर एक के माँ के *** को देख लूँगा ।
बंसल तब तक पुलिस चौकी की टूटी कुर्सी पर बैठ चुका था रूप उसके पैरों के पास नीचे बैठ गया । वैसे साहब पूरे परदेश की पुलिस फोर्स तो यहाँ मर** रही है । तो चुनाव कैसे होंगे । बंसल ...चुनाव का क्या है चू**ये वो तो हो ही जायेगा । ये ओबामा कौन साला पूरे चुनाव के लिए यहाँ आ रहा है । तीन दिन का दौरा है । तीन दिन बाद वो चला जाएगा इस्लामाबाद पाकिस्तान की बजा** और हम यहाँ मिल कर चुनाव की ड्यूटी कर लेंगे ।
देख रूप चुनाव तो तू भूल जा । मुझे भी सबने यही कहा है । तू सिर्फ़ ध्यान दे ओबामा पर पूरी मध्य प्रदेश पुलिस महकमे की इज्ज़त की बात है । अरे होगी स्काट लैण्ड पुलिस न्यूयार्क पुलिस एम् पी पुलिस किसी से भी कम नही ।
अदृश्य शक्ति अदृश्य शक्ति !!! ये अदृश्य शक्ति क्या है । खेतो से थक हार कर लौटे राधेलाल ने अपने बापू से पुछा । अरे अदृश शक्ति यानि बहुत बड़ी ताक़त जो दिखाई नही देती । पर सारी चीजों को वो हो चलाती है । (नेता जी को वोट दो । बटन दाबो बाल्टी पे । बाल्टी को जो वोट देगा उसको पानी मिलेगा भरपूर चुनाव चिन्ह बाल्टी दीनाजी की बाल्टी हम सबकी बाल्टी प्रचार की गाड़ी घुर घुर शोर मचाती तीन चार राउंड लगाकर धूल उडाती चली गई ।)
आपके लोक प्रिय प्रत्याशी दीनाजी की आम सभा शाम सात बजे बस स्टेंड पर । चुनाव चिन्ह बाल्टी ।( प्रचार की गाड़ी में बैठे श्यामूं ने कहा बहुत हो गई बाल्टी बाल्टी बाल्टी अब बाटली बोले तो बोतल ला । गला दुख रहा है भाई )
अदृश्य शक्ति अदृश्य शक्ति
आ
रही है अदृश्य शक्ति
पाँच
साल में दिखती है
अदृश्य
शक्ति अदृश्य शक्ति
अद्भुत शक्ति अद्भुत शक्ति
अदृश्य
शक्ति अदृश्य शक्ति
सारी पुलिस फोर्स उमरानाला में
रुकता नही फ़िर काम रे
चाकू
चले छुरी चले
इससे
इनको क्या काम रे
फ़िर
भी देखो सब
ठीक
ठाक ही चल रहा है
ओबामा भारत आने को मचल रहा है
अदृश्य शक्ति अदृश्य शक्ति
अद्भुत शक्ति अद्भुत शक्ति
अदृश्य
शक्ति अदृश्य शक्ति sss
(समापन किस्त अगली कड़ी में ओबामा आ रहे हैं उमरानाला )

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

जनतंत्र का डमरू जनतंत्र का जंतर

"जनतंत्र का डमरू जनतंत्र का जंतर "
आबाजी (दादाजी)

चुनाव के रंग बिरंगे इस महा पर्व में उमरानाला गाँव की गलियां चुनावों के रंग में गुलज़ार है। वोट कहानी जो इस ब्लॉग पर विधानसभा चुनाव २००८ के समय शुरू हुई थी ...उसके विस्तार का माकूल समय आ गया है । उमरानाला की गलियों में यहाँ दिल्ली से बैठकर चुनाव उसके हर रंग को देखने की एक छोटी सी कोशिश है ..."जनतंत्र का डमरू जनतंत्र का जंतर ...."आशाएं ,उम्मीदें ,हम सबके ख्वाब चुनाव के समय जैसे इन्हे नए पंख मिल जाते हैं । दीवारों पर नारे पोस्टर बैनर पार्टियों के घोषणा पत्र । उमरानाला में बचपन से ही चुनाव के इस माहौल को करीब से देखा और महसूस किया है ।
बड़े बड़े नेताओं की जन सभाओ को देखा । गाँव के भोले भाले सपने भी देखे । आज जैन दादाजी की याद आ रही है । जिन्हें हम सभी प्यार से " आबाजी " कहते थे । मराठी में दादा के लिए आबा शब्द का प्रयोग होता है । चुनाव के वक्त जैन दादाजी की दवाईयों की दुकान में अखबार की तादात बढ़ जाती थी ...वो
पढने के बेहद शौकीन थे । अख़बार पत्रिकाएं रेडियो टेलिविज़न चुनाव की हर ख़बर पर वो पैनी नज़र रखते थे ।
उनका एक विशेष दल से लगाव था । उनकी सोच में छोटे बड़े हर मुद्दे होते थे । लोगो की भीड़ ...छोटे बड़े नेताओं का जमावडा चाय की चुस्कियां और चुनाव के हर रंग । देश कहाँ जा रहा है ... गर्मियों के समय रात में खाने के बाद मैं अक्सर उनकी राजनैतिक चर्चाओं का हिस्सा बन जाता था ।
एक बार उन्होंने कहा था ...हमारे देश में इलेक्शन नही सलेक्शन होना चाहिए । एक दल विशेष से लगाव होने के बावजूद वो उम्मीदवार की व्यक्तिगत छबी को हमेशा ध्यान में रखते थे ।
गाँव की गलियों में सब कुछ बदल रहा है । चुनाव भी बदले ...ठप्पा ईवीएम मशीन में बदल गया । बटन दबाकर नेताओं की तकदीरों के फैसले होने लगे हैं ... लेकिन आज भी चुनाव और उसको लेकर उत्साह जस का तस् है । हमारे गाँव में अधिकांश लोग कृषि से जुड़े हैं । खेतों में खलियानों से चुनाव की फिजा बहती है । "जनतंत्र का डमरू जनतंत्र का जंतर "में हम हमारे देश के महान लोकतंत्र को उमरानाला की इन्ही फिजाओ से महसूस करने की कोशिश करेंगे । उमरानाला पोस्ट को एक साल पूरे हो गए हैं । और अब लगता है ...जैसे मेरा यह छोटा सा गाँव महज एक भूगोल नही है ...इसका विस्तार हो चुका है । उमरानाला ग्लोबल बन गया है । जिसके सीमांत अब लकीरों में नही ..बल्कि हम सब के भीतर कहीं न कहीं बसते हैं !!!

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

ऍफ़ एम् (समापन किस्त )

प्यार का पहला ख़त

तकरीबन रात आठ बजे तृष्णा तन्सरा बिछुआ रोड पर उतर गया । रात काफ़ी हो चुकी थी । वो तेज़ कदमों साथ घर की ओर बढ़ने लगा ...रास्ते में घरों के चूल्हे से रात का खाना बनने की लजीज खुशबू आ रही थी । चूल्हे का धुआ ..दिन भर पेट में चूहे कूदे ..तृष्णा घर आ गया । बड़ी देर कर दी ...हाथ मुहं धो के खाना खा ले । माँ ने कहा । तृष्णा ने अपने कमरे में रेडियो चालू कर दिया ...मक्के ज्वार की रोटी सेमी की सब्जी और प्याज़ की तीखी चटनी दिन भर की भूख को और भी बढ़ा रही थी । रेडियो पर फिल्मी गीतों का कार्यक्रम " एक फनकार " शुरू हो चुका था । तृष्णा ने भीतर से अपना कमरा बंद कर लिया । घर पर सभी लोग सो चुके थे । तृष्णा ने अपने बैग से दो दिल वाला ग्रीटिंग कार्ड निकला ..अंजुम को पहला ख़त लिख ...क्या लिखूं ? कुछ समझ नही आ रहा था ...गुलाबी स्याही वाला खुशबू वाला पेन तृष्णा कभी ...पेन को मुंह में दबाता कभी ...टेबल पर रख देता ...कमरे में टहलते हुए वो ग्रीटिंग कार्ड को देख रहा था ।
लैटर पेड के चिकना पन्ना उसमे बना दिल ....तृष्णा ने लिखना शुरू किया ...मेरी प्यारी ..कट कट ...पहला सफा उसने फाड़ दिया ...क्या लिखूं माय डीअर ...मेरी प्यारी मेरी प्यारी प्यारी ...तृष्णा पाँच छ सफे जाया कर चुका था । और फ़िर

मेरी प्यारी अंजुम ,
जन्म दिन की ढेरो शुभकामनाये !!
HAPPY BIRTH DAY TO YOU !!!
मैं नही जानता तुम इस ग्रीटिंग कार्ड और मेरी भावनाओ के बारे में क्या सोचती हो । लेकिन मेरे दिल ने कहा कि तुमसे अपने प्यार का इज़हार करूँ ।मेरे इस ख़त को पढ़कर तुम नाराज़ न होना ...तू मेरी ज़िन्दगी है .....................................................................................
....................................................................................................
......................................................................................................
.........तृष्णा की रफ्तार बढती जा रही थी । जैसे दिल से कोई बात अपने आप निकल रही थी ....प्यार का पहला ख़त ..जिसकी शुरुआत उसे लगभग नामुमकिन लग रही थी ...वो लिखते लिखते .............
पूरे
दो पन्नो का ख़त लिख बैठा ।
अगर अच्छा न लगे तो ख़त फाड़ देना ।
तुम्हारा
अपना
तृष्णा
तृष्णा ने ग्रीटिंग कार्ड पर टू डीअर अंजुम फ्रॉम तृष्णा लिखकर उसे अच्छी तरह चिपका दिया । रात के करीब बारह बज चुके थे । तृष्णा ने अपने पहले ख़त में कुछ रूमानी गाने भी लिखे । शायद वो उसके क्रिएटिव पोएटिक जीवन की पहली शुरुआत भी थी । ख़त में लिखी पहली कविता की कुछ लाईने उसने अपनी डायरी में भी लिख ली । रात भर तृष्णा करवट बदलता रहा । अंजुम ख़त के बारे में क्या सोचेगी । कहीं वो ख़त स्कूल में किसी टीचर को न दे दे ...या घर वालों को तृष्णा को अंजुम के अब्दुल चाचा से डर लगता था । अब्दुल चाचा टेक्सी चलाते थे ...और मोटर लाइन में होने के कारण कुछ फसादी किस्म के भी थे .अंजुम को भी उनसे डर लगता था ।
रेडियो पर भक्ति संगीत के साथ तृष्णा की सुबह हो गई । स्कूल जाते समय बड़ी हिम्मत कर तृष्णा ने अंजुम को ग्रीटिंग कार्ड और उसमे रखा ख़त दे दिया । इसे अकले में पढ़ लेना । अगर अच्छा न लगे तो फाड़ देना ।अचानक तृष्णा को क्या हुआ अंजुम सोच में पड़ गई .लेकिन उसने हलकी मुस्कराहट के साथ तृष्णा से बेझिझक ख़त ले लिया । तृष्णा तेज़ी के साथ स्कूल की तरफ बढ़ने लगा । उसने अंजुम को बताया आज शाम रेडियो पर मेरा इंटरव्यू आएगा ....
दोनों दिन भर कशमकश में स्कूल में रहे । तृष्णा बार बार उसे क्लास में देख रहा था उसने वो ख़त पढ़ा या नही ... उसका ध्यान उसकी फिजिक्स की मोटी किताब पर था जिसमे उसने ग्रीटिंग कार्ड रखा था ।शाम को तृष्णा अंजुम के साथ घर नही जाना चाहता था । लेकिन तृष्णा के स्कूल से निकलते ही वो उसके साथ तन्सरा के लिए निकल पड़ी ... तृष्णा ने पुछा कार्ड देखा क्या । रास्ते में अंजुम ने कार्ड खोल लिया ...वो चलते चलते तृष्णा के सामने उसका ख़त पढ़ती जा रही थी । अंजुम ने कहा कितने बजे तुम्हारा इंटरव्यू आएगा ...तृष्णा ने दबी आवाज़ में कहा ...छ बजे ठीक है में घर आई हूँ दोनों साथ में सुनेंगे ।
दोनों ने साथ में रेडियो पर इंटरव्यू सुना । अंजुम ने प्रेक्टिकल कापी के बीच में रख कर एक पर्ची दी ...उसने कहा इसे अकेले में पढ़ लेना ।
गाय को चारा पानी दे दे sssss...अंदर से आवाज़ आई तृष्णा प्रेक्टिकल कापी में रखी पर्ची को लेकर खेत की तरफ बढ़ने लगा । "I LOVE YOU ग्रीटिंग कार्ड अच्छा था । तृष्णा की मुहब्बत की गाड़ी चल निकली .....

(पाँच साल बाद )

स्कूल में शुरू हुआ प्यार ...कॉलेज में आ गया । तृष्णा का रेडियो प्रेम और अंजुम प्रेम दोनों परवान पर रहे ... तृष्णा अंजुम कॉलेज में भी साथ में थे । एम ए फाइनल ईयर में तृष्णा को अंजुम ने एक ख़त दिया ..घर में उसकी शादी की बात चल रही है ....हमारे रास्ते अलग हैं .......नदी के दो किनारे कभी मिलते नही ..तृष्णा अंजुम के आखरी ख़त को नम आँखों से पढ़ रहा था । कुछ शब्द डी फोकस हो रहे थे । तुम हमेशा खुश रहना ...रेडियो पर तुमको सुनते रहूंगी ....अंजुम ने लिखा।
एक
सौ दो दशमलव दो मेगा हर्ट्ज़ आकाशवाणी के छिदवाडा केन्द्र रेडियो पर गीत बज रहा था " ये प्यार था या कुछ और था न तुझे पता न मुझे पता " तृष्णा ने छिंदवाडा गुलाबरा में अपने कमरे में रेडियो की आवाज़ तेज़ कर दी , आज भी रेडियो पर जब भी ये नगमा बजता है तृष्णा भावुक हो जाता है ....और ऍफ़ एम् की आवाज़ ..ज़ाहिर है तेज़ हो जाती है । ये निगाहों का ही कसूर था न तेरी खता न मेरी ....
(कहानी अधूरी है )